Sunday, May 20, 2018

वोट शब्द कहाँ से आया?




वोट शब्द राय देने, चयन करने किसी व्यक्ति या प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के अर्थ में इस्तेमाल होता है. अंग्रेजी में यह संज्ञा और क्रिया दोनों रूपों में चलता है. अंग्रेजी में यह शब्द लैटिन के वोटम (votum) से बना है. इसका मतलब है इच्छा, कामना, प्रतिज्ञा, प्रार्थना, निष्ठा, वचन, समर्पण वगैरह. हिन्दी में इसका इस्तेमाल मत के अर्थ में लिया जाता है. अंग्रेजी की तरह हिन्दी ने भी मतदाता या निर्वाचक के लिए वोटर शब्द का इस्तेमाल स्वीकार कर लिया है. शब्दों का अध्ययन करने वाले अजित वडनेरकर के अनुसार भाषा विज्ञानी इसे प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द मानते हैं. अंग्रेजी का वाऊ vow इसी श्रृंखला का शब्द है जिसका मतलब होता है प्रार्थना, समर्पण और निष्ठा के साथ अपनी बात कहना.

‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ व्यवस्था क्या है?

लोकतंत्र में चुनाव सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. प्रतिनिधि के चयन से लेकर फैसले करने तक सारी बातें वोट से तय होती हैं. चुनाव की अनेक पद्धतियाँ दुनिया में प्रचलित हैं. ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ भी चुनाव की एक पद्धति है. जब एक से ज्यादा प्रत्याशी किसी पद के लिए खड़े हों, तब सबसे ज्यादा वोट पाने वाले व्यक्ति को चुना हुआ माना जाता है. भारत में चुनाव की यही पद्धति है.

चीनी सबसे पहले कहाँ बनी?

मीठे फल और गन्ने के रस का इस्तेमाल इंसान न जाने कब से करता रहा है. पर रस से क्रिस्टल के रूप में चीनी बनाने का काम सबसे पहले भारत में हुआ. इतिहासकारों का मत है कि ईसवी सन 350 के आसपास गुप्तवंश के दौर में चीनी बनती थी. संभव है इससे पहले भी बनती रही हो. संस्कृत के शर्करा से अरब में शक्कर और उससे अंग्रेजी का शुगर शब्द बना. लैटिन में सकारम (succharum) भी भारत से गया. ईसा से साढ़े तीन सदी पहले भारत आई सिकंदर की सेना भारत में बगैर मधुमक्खी के मधु को खाकर हैरान थी. शायद वह गुड़ का कोई रूप था.

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Saturday, May 12, 2018

संयुक्त राष्ट्र शांति-सेना क्या होती है?


संयुक्त राष्ट्र शांति-सेना संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की सेनाओं की मदद से एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में अलग-अलग परिस्थितियों में गठित की जाती है. इसका उद्देश्य टकराव को दूर करके शांति स्थापित करने में मदद करना होता है. संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक नीले रंग की टोपियाँ लगाते हैं या नीले रंग के हेल्मेट पहनते हैं, जो अब इस सेना की पहचान बन गई है.

संयुक्त राष्ट्र की अपनी कोई सेना नहीं होती. इस सेना के सदस्य अपने देश की सेना के सदस्य ही रहते हैं. शांति-सेना के रूप में कार्य करते समय यह सेना संयुक्त राष्ट्र के प्रभावी नियंत्रण में होती है. शांति-रक्षा का हर कार्य सुरक्षा परिषद द्वारा अनुमोदित होता है. संयुक्त राष्ट्र के गठन के समय इस सेना की परिकल्पना नहीं की गई थी, बल्कि बदलते हालात के साथ इसका विकास होता गया. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में सुरक्षा परिषद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है. संयुक्त राष्ट्र के शांति-ऑपरेशंस का एक अलग विभाग बन गया है, जिसके प्रमुख इस समय ज्यां-पियरे लैक्रो हैं.

संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन सबसे पहले 1948 में अरब-इसरायल युद्ध के समय भेजा गया था. उसके बाद से संयुक्त राष्ट्र के 63 मिशन भेजे जा चुके हैं, जिनमें से 17 आज भी सक्रिय हैं. सन 1988 में संयुक्त राष्ट्र शांति-रक्षा बल को नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया. संयुक्त राष्ट्र के पूर्ववर्ती संगठन लीग ऑफ नेशंस के सामने शांति स्थापना के ज्यादा अवसर नहीं आए, पर सन 1934-35 में लीग ऑफ नेशंस के नेतृत्व में जर्मनी के सार क्षेत्र में सेना भेजी गई. इसे दुनिया की पहली शांति-स्थापना से जुड़ी संयुक्त सैनिक कार्रवाई माना जा सकता है. पहले विश्व युद्ध के काफी समय बाद सार क्षेत्र में जनमत संग्रह के संचालन के लिए इसकी जरूरत महसूस की गई. 

भारत में गाँवों की सही संख्या क्या है?

गूगल पर सर्च करें तो कई तरह की संख्याएं सामने आएंगी. ज्यादातर 6,40,000 को आसपास हैं. हाल में जब भारत सरकार ने घोषणा की कि देश के सभी गाँवों में बिजली पहुँचा दी गई है, तब यह संख्या 5,97, 464 बताई गई. दरअसल यह संख्या राजस्व गाँवों की संख्या है. जन 2011 की जनगणना में राजस्व गाँवों की संख्या 5,97, 464 बताई गईं थी. गाँव की बस्ती, पुरवा जैसी कई परिभाषाएं हैं. यदि कुछ लोग कहीं घर बनाकर रहने लगें, तो आधिकारिक रूप से उसे तबतक गाँव नहीं कहेंगे, जबतक राजस्व खाते में उसका नाम दर्ज न हो जाए. शहरों के विकास के साथ हमारे देश में बहुत से गाँवों और बस्तियों का अस्तित्व खत्म भी होता जा रहा है, इसलिए यह संख्या बदलता रहती है.

सोशल मीडिया में डीपी किसे कहते हैं?

डीपी माने डिस्प्ले पिक्चर. आपकी वह तस्वीर जो आपकी पहचान है. कुछ लोग अपनी तस्वीर लगाते हैं और कुछ लोग प्रतीक रूप में किसी दृश्य या वस्तु की तस्वीर भी लगाते हैं. समय पड़ने पर उसमें बदलाव भी करते हैं जैसे हाल में कुछ लोग ने जम्मू-कश्मीर में एक बालिका के साथ हुए बलात्कार के प्रति रोष जाहिर करने के लिए अपनी डीपी काली कर दी थी.

कम्प्यूटिंग या डिजिटल मीडिया के उदय के साथ जब कई तरह के फोरम जन्म लेने लगे तब यूजर की पहचान का सवाल भी उठा. इसके लिए शुरूआती शब्द बना अवतार. अवतार भारतीय पौराणिक शब्द है, जिसे इंटरनेट पर इस रूप में जगह मिली. कई जगह इसे पायकन (पर्सनल आयकन) भी कहा गया. अवतार शब्द का सबसे पहला इस्तेमाल सन 1979 में कम्प्यूटर गेम प्लेटो में देखने को मिला, पर ऑन-स्क्रीन परिचय के लिए 1985 में कम्प्यूटर गेम अल्टिमा-4

केसर क्या होता है?

केसर कृषि-उत्पाद है यानी कि उसकी खेती होती है. भारत की केसर दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाती. भारत में जम्मू-कश्मीर में केसर की खेती होती है. कश्मीर के अवंतीपुर के पंपोर और जम्मू संभाग के किश्तवाड़ इलाके में केसर की खेती की जाती है. केसर बोने के लिए खास जमीन की आवश्यकता होती है. ऐसी जमीन जहां बर्फ पड़ती हो और जमीन में नमी मौजूद रहती हो. जिस जमीन पर केसर बोयी जाती है वहां कोई और खेती नहीं की जा सकती. कारण, केसर का बीज हमेशा जमीन के अंदर ही रहता है. इस बीज को निकाल कर उमसे दवाइयाँ और खाद मिलाकर फिर से बोया जाता है. यह बुआई जुलाई-अगस्त में की जाती है. केसर के फूल अक्टूबर-नवंबर में खिलने लगते हैं. जमीन में जितनी ज्यादा नमी होगी, केसर की पैदावार भी उतनी ही ज्यादा होगी. केसर का फूल नीले रंग का होता है. नीले फूल के भीतर पराग की पांच पंखुड़ियां होती हैं. इनमें तीन केसरिया रंग की और बीच की दो पंखुड़ियां पीले रंग की. केसरिया रंग की पंखुड़ियाँ ही असली केसर कही जाती हैं.




Sunday, May 6, 2018

दुनिया में कुल कितनी भाषाएं हैं?

अनुमान है कि पूरी दुनिया में भाषाओं की संख्या तीन से आठ हजार के बीच है। वस्तुतः यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप भाषा को किस तरह से परिभाषित करते हैं। अलबत्ता दुनिया की भाषाओं के एथनोलॉग कैटलॉग के अनुसार दुनिया में इस वक्त 6909 जीवित भाषाएं हैं। इनमें से केवल 6 फीसदी भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस लाख या ज्यादा है। एथनोलॉग कैटलॉग के बारे में जानकारी यहाँ मिल सकती है।

विश्व पत्रकारिता और हिन्दी पत्रकारिता दिवस

अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस (वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे) हर साल 3 मई को मनाया जाता है। वर्ष 1991 में युनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर इसे मनाने का निर्णय किया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी इसकी घोषणा की। युनेस्को महा-सम्मेलन के 26वें सत्र में 1993 में इससे संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था। इसे मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के जुड़े विभिन्न पक्षों को लेकर वैश्विक-जागरूकता बढ़ाना है।

हिन्दी पत्रकारिता दिवस भी मई में मनाया जाता है। इसकी तारीख है 30 मई। 30 मई, 1826 में पंडित युगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के पहले समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन व सम्पादन आरम्भ कोलकाता से किया था। इस प्रकार भारत में हिन्दी पत्रकारिता की आधारशिला उन्होंने रखी। उस समय अंग्रेज़ी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकल रहे थे किन्तु हिन्दी में एक भी पत्र प्रकाशित नहीं होता था। प्रारंभिक रूप में इसकी केवल 500 प्रतियां ही मुद्रित हुई थीं। इसका प्रकाशन लम्बे समय तक न चल सका, क्योंकि इसके प्रकाशन का खर्च निकाल पाना मुश्किल हो गया था। अंतत: 4 दिसम्बर 1826 को इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।

उंगलियों के निशान क्यों महत्वपूर्ण होते हैं?
प्रकृति ने सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है। दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते। इन्हें एपिडर्मल रिज कहते हैं। हमारी त्वचा जब दूसरी वस्तुओं के साथ सम्पर्क में आती है तब ये उभार उसे महसूस करने में मददगार होते हैं। साथ ही ग्रिप बनाने में मददगार भी होते हैं। किसी भी वस्तु के साथ सम्पर्क होने पर ये निशान उसपर छूट जाते हैं। इसकी वजह है पसीना, जो हमारी त्वचा को नर्म बनाकर रखता है। तमाम दस्तावेजों में जहाँ व्यक्ति दस्तखत नहीं कर पाता उसकी उंगलियों के निशान लिए जाते हैं। आधार पहचान-पत्र में इसीलिए उंगलियों के निशान लिए जाते हैं। फोरेंसिक विज्ञान के विस्तृत होते दायरे में अब दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना आसान हो गया है। इसके तहत संदेह की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती। विज्ञान के अनुसार भले ही ये निशान फौरी तौर पर लगभग एक जैसे दिखाई पड़ें, पर उनमें समानता नहीं होती। इस अंतर का पता सूक्ष्म विश्लेषण से ही हो सकता है।

Thursday, May 3, 2018

मई दिवस क्यों मनाते हैं?


मई दिवस के दो अर्थ हैं. एक अर्थ है यूरोप में मनाया जाने वाला पारम्परिक मई दिवस और दूसरा है उन्नीसवीं सदी से शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस. दोनों 1 मई को मनाए जाते हैं. पारम्परिक अर्थ में यह यूरोप के पुराने मूर्ति-पूजक त्योहारों से जुड़ा है. उत्तरी गोलार्द्ध में यह भीषण सर्दियों की समाप्ति का संकेत भी करता है. जैसे-जैसे यूरोप ईसाई बनता गया, मूर्तिपूजक छुट्टियों की धार्मिक विशेषता खो गईं. शुरुआती मई दिवस समारोह, फूलों की रोमन देवी के त्योहार फ्लोरा और जर्मेनिक देशों के समारोह वालपुर्गिस नाइट के साथ तब मनाए जाते थे, जब यूरोप में ईसाई धर्म नहीं आया था. यूरोप में धर्मांतरण की प्रक्रिया के दौरान, कई मूर्तिपूजक समारोहों को त्याग दिया गया था, या उन्हें नया रूप दिया गया. मई दिवस का एक धर्मनिरपेक्ष संस्करण यूरोप और अमेरिका में मनाया जाता रहा है. इस रूप में, मई दिवस को मेपोल के नृत्य और मई की महारानी के राज्याभिषेक की परम्परा में मनाते हैं.

श्रमिक दिवस के रूप में 1 मई को आठ घंटे के कार्य-दिवस के लिए हुए संघर्ष की स्मृति में मनाया जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस कहते हैं. एक जमाने तक दुनिया में श्रमिकों के काम का समय निर्धारित नहीं था. इसके लिए संघर्ष चला और अमेरिका में इसकी खूनी परिणति हुई. इसे 4 मई 1886 के शिकागो के हेमार्केट प्रकरण के रूप में याद किया जाता है. हेमार्केट मामला शिकागो, इलिनॉय, संयुक्त राज्य अमेरिका में तीन दिन की आम हड़ताल के दौरान हुआ था, जिसमें आम मज़दूर, कारीगर, व्यापारी और दूसरे लोग शामिल थे. आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से चार हड़ताली मारे गए. इसके अगले दिन हेमार्केट चौक में एक रैली हुई, जिसमें एक अज्ञात हमलावर ने बम फेंका, जिसमें सात पुलिसकर्मियों समेत करीब एक दर्जन लोगों की मौत हुई. इसके बाद एक मुकदमा चला, जिसके बाद चार लोगों को फाँसी दी गई. इस घटना से दुनियाभर में गुस्से की लहर फैल गई और अंततः दुनिया के मजदूरों के काम के घंटे आठ निर्धारित हो गए. उसकी याद में मई दिवस मनाया जाता है. यह भी रोचक है कि अमेरिका में काफी पहले से श्रम दिवस सितम्बर के पहले सोमवार को मनाया जाता है. बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उन्होंने 1 मई को लॉयल्टी डे के रूप में मनाना शुरू कर दिया है. समाजवाद और साम्यवाद के उभार के बाद सन 1904 में सेकंड इंटरनेशनल ने मई दिवस को अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस मनाने का फैसला किया. 

भारत में पहली ट्रेन कब चली?

16 अप्रैल 1853 को मुम्बई और ठाणे के बीच जब पहली रेल चली. ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के 14 डिब्बों वाली उस गाड़ी के आगे एक छोटा फॉकलैंड नाम का भाप इंजन लगा था. पहली ट्रेन ने 34 किलोमीटर का सफर किया. भारत में रेल की शुरुआत की कहानी अमेरिका के कपास की फसल की विफलता से जुड़ी हुई है, जहां वर्ष 1846 में कपास की फसल को काफी नुकसान पहुंचा था. इसके कारण ब्रिटेन के मैनचेस्टर और ग्लासगो के कपड़ा कारोबारियों को वैकल्पिक स्थान की तलाश करने पर विवश होना पड़ा था. अंग्रेज़ों को प्रशासनिक दृष्टि और सेना के परिचालन के लिए भी रेलवे का विकास करना तर्क संगत लग रहा था. ऐसे में 1843 में लॉर्ड डलहौजी ने भारत में रेल चलाने की संभावना तलाश करने का कार्य शुरु किया. डलहौजी ने बम्बई, कोलकाता, मद्रास को रेल सम्पर्क से जोड़ने का प्रस्ताव किया. इस पर अमल नहीं हो सका. साल 1849 में ग्रेट इंडियन पेंनिनसुलर कंपनी कानून पारित हुआ और भारत में रेलवे की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ.

उंगलियों के निशानों की क्या खासियत होती है?

प्रकृति ने सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है. दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते. इन्हें एपिडर्मल रिज कहते हैं. हमारी त्वचा जब दूसरी वस्तुओं के साथ सम्पर्क में आती है तब ये उभार उसे महसूस करने में मददगार होते हैं. साथ ही ग्रिप बनाने में मददगार भी होते हैं. किसी भी वस्तु के साथ सम्पर्क होने पर ये निशान उसपर छूट जाते हैं. इसकी वजह है पसीना, जो हमारी त्वचा को नर्म बनाकर रखता है. तमाम दस्तावेजों में जहाँ व्यक्ति दस्तखत नहीं कर पाता उसकी उंगलियों के निशान लिए जाते हैं. आधार पहचान-पत्र में इसीलिए उंगलियों के निशान लिए जाते हैं. फोरेंसिक विज्ञान के विस्तृत होते दायरे में अब दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना आसान हो गया है. इसके तहत संदेह की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रहती. विज्ञान के अनुसार भले ही ये निशान फौरी तौर पर लगभग एक जैसे दिखाई पड़ें, पर उनमें समानता नहीं होती. इस अंतर का पता सूक्ष्म विश्लेषण से ही हो सकता है.


Sunday, April 22, 2018

एकसाथ चुनाव की अवधारणा क्या है?


गत 29 जनवरी को बजट सत्र के अभिभाषण में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्य विधानसभाओं के और लोकसभा के चुनाव एकसाथ कराने की वकालत करते हुए कहा कि इस विषय पर चर्चा और संवाद बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के किसी न किसी हिस्से में लगातार हो रहे चुनाव से अर्थव्यवस्था और विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे मानव संसाधन पर बोझ तो बढ़ता ही है, आचार संहिता लागू होने से देश की विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कहा कि विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों के साथ स्थानीय निकाय-चुनावों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही इस विषय पर देश में बहस चल पड़ी है। इस अवधारणा के विरोधियों का कहना है कि देश की भौगोलिक और राजनीतिक विविधता को देखते हुए ऐसा करना उचित नहीं होगा। पिछले कुछ समय में संसद की स्थायी समिति और नीति आयोग ने दो अलग-अलग रिपोर्टों में साथ-साथ चुनाव कराने का समर्थन किया है।

देश के पहले आम चुनाव 1951-52 में हुए थे। उस वक्त सभी विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ ही हुए। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 तक साथ-साथ चुनाव हुए। सन 1967 में कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। कुछ राज्यों में समय से पहले ये सरकारें गिरीं और वहाँ चुनाव हुए, जिससे एकसाथ चुनावों का चक्र टूट गया। इसके बाद सन 1970 में पहली बार केन्द्र सरकार ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया और 1971 में केवल लोकसभा के चुनाव हुए।

पकौड़ा कहाँ से आया?

पकौड़ा, पकौड़ी, फक्कुरा, भजिया, भाजी और पोनाको दक्षिण एशिया में प्रचलित नमकीन व्यंजन है, जो खासतौर से भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में गली-गली बनता मिलेगा। दुनिया में जबसे डीप फ्राई व्यंजनों का चलन शुरू हुआ है पकौड़ा किसी न किसी रूप में हमेशा हाजिर रहा है। यह शब्द सम्भवतः पक्व+वट से मिलकर बना है। वट, वटक और वड़ा इसके दूसरे रूप हैं। आंध्र प्रदेश में पकौडा है तो उत्तर भारत के कुछ इलाकों में पकौरा भी चलता है।

दक्षिण भारत का बोंडा और मुम्बई में पाव के साथ मिलने वाला वड़ा इस पकौड़े का ही एक रूप है। बांग्लादेश के कुछ इलाकों में फक्कुरा। र और ड़ के उच्चारण की भिन्नता के कारण भी ऐसा है। कर्नाटक में भाजी है, तो अफ्रीका के सोमालिया में बजिए। दक्षिण अफ्रीका के कुछ इलाकों में ढाल्टी नाम से पकौड़ों जैसा व्यंजन बनता है, जो मुस्लिम इलाकों में रोजों के दौरान इफ्तार में खाया जाता है। दक्षिण एशिया में यह आमतौर पर बेसन या चने की दाल को पीसकर तैयार पेस्ट में सब्जियाँ मिलाकर बनाया जाता है।

मूँग की दाल से बनता है, तो मुँगौड़ा और उरद की दाल से वड़ा। देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-लग ढंग से बनने वाली कढ़ी में भी इसे जगह मिली है। पुर्तगाली डिश टेम्पूरा, जापान में जाकर काफी लोकप्रिय हुआ है। इसी तरह दुनियाभर में मिलने वाले तरह-तरह के फ्रिटर्स भी पकौड़े ही हैं। इसमें अंडे और सीफूड को भी जगह मिल गई। भारत में सामान्यतः यह बेसन से बनता है, पर आटे, सूजी और मैदा की मिलावट के साथ इसके नाम भी बदलते जाते हैं। राजस्थान का मिर्ची वड़ा, दिल्ली का ब्रेड पकौड़ा, अंडा पकौड़ा, प्याज पकौड़ा, पनीर पकौड़ा से लेकर चिकन पकौड़ा और फिश पकौड़ा तक इसके तमाम रूप हैं।

Thursday, April 19, 2018

सीरिया में लड़ाई क्यों?

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ पिछले सात साल से विद्रोह चल रहा है, जिसका इसरायल, सउदी अरब, तुर्की, अमेरिका और पश्चिमी देश अपने-अपने तरीके से समर्थन कर रहे हैं. दूसरी तरफ बशर-अल-असद की सरकार को ईरान और रूस का समर्थन प्राप्त है. यह बगावत गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. सन 2011 में कई अरब देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया है.

सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. यह संघर्ष साम्प्रदायिक रूप ले चुका है, जिसमें जेहादी ग्रुपों को पनपने का मौका मिला. इसी दौरान इराक में इस्लामिक स्टेट उभार शुरू हुआ, जिसने उत्तरी और पूर्वी सीरिया के काफी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया. दूसरी तरफ ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरिया की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे हैं. सीरिया, इराक़ और तुर्की की सीमा पर बड़ी संख्या में कुर्दों की आबादी भी है. वे एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए अलग लड़ रहे हैं.

इस प्रकार इस इलाके में कई तरह की ताकतें, कई तरह की ताकतों से लड़ रहीं हैं. पश्चिमी देशों का आरोप है कि सीरिया की सेना विद्रोहियों का दमन करने के लिए रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है. सीरिया पर पश्चिमी देशों के नवीनतम हमलों की वजह यह बताई जा रही है कि गत 7 अप्रैल को पूर्वी गोता इलाके के डूमा में सीरिया की सेना ने विद्रोहियों और राहत-कर्मियों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया, जिसमें 40 लोग मारे गए.

बोआओ फोरम क्या है?

बोआओ फोरम एशिया (बीएफए) व्यापारिक सहयोग और विमर्श का फोरम है, जिसे दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के तर्ज पर गठित किया गया है. इसका मुख्यालय चीन के हैनान प्रांत के बोआओ में है. सन 2001 से यहाँ एशिया की सरकारों और उद्योगों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हो रहा है. यह फोरम क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के इरादे से गठित किया गया है. इसमें एशिया के देशों को आर्थिक-विकास की राह पर चलते हुए अपनी अर्थ-व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाने का मौका मिलता है. इसे शुरू करने का विचार मूलतः फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल वी रैमोस, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री बॉब हॉक और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री मोरीहीरो होसोकावा ने बनाया था.

इसका उद्घाटन 27 फरवरी 2001 को हुआ था. इसके लिए चीन ने खासतौर से पहल की. इसकी शुरूआत 26 देशों की भागीदारी के साथ हुई थी. इस वक्त इसके 29 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल हैं. इससे जुड़े संगठन की पहली बैठक 12-13 अप्रैल 2002 को हुई. हाल में 8 से 11 अप्रैल 2018 को फोरम का सालाना सम्मेलन हुआ. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपनी भावी आर्थिक नीतियों की ओर इशारा किया. हालांकि भारत की ओर से इस सम्मेलन में कोई बड़ी राजनीतिक हस्ती उपस्थित नहीं थी. केवल उद्योग-व्यापार संगठन फिक्की के प्रतिनिधि इसमें उपस्थित थे.

बोआओ फोरम में आर्थिक एकीकरण के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय-प्रश्नों पर भी विचार किया जाता है. यह फोरम एक तरह से चीन और वैश्विक-व्यापार के बीच की कड़ी बना. सन 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का सदस्य भी बना था.

डब्लूटीओ में कितने सदस्य हैं?

विश्व व्यापार संगठन में 164 सदस्य और 23 पर्यवेक्षक देश हैं. 14 जुलाई 2016 को लाइबेरिया इसका 163वाँ और 29 जुलाई 2016 को अफ़ग़ानिस्तान इसका 164वाँ सदस्य बना.

प्रभात खबर अवसर में प्रकाशित

Saturday, April 14, 2018

मैराथन दौड़ की कहानी क्या है?


मैराथन दुनिया में सबसे लम्बी दूरी की दौड़ है. आधिकारिक रूप से इसकी लम्बाई 42.195 किलोमीटर (26 मील 385 गज) होती है. सामान्यतः यह सड़क पर होने वाली दौड़ है, जिसका छोटा सा हिस्सा ही स्टेडियम के भीतर होता है. सन 1896 में जब आधुनिक ओलिम्पिक खेल शुरू हुए तब मैराथन दौड़ भी उसका हिस्सा थी. पर उस वक्त इसकी लम्बाई का मानकीकरण नहीं हुआ था. इसकी लम्बाई का निर्धारण सन 1921 में हुआ.

दुनिया में आज 800 से ज्यादा ऐसी मैराथन प्रतियोगिताएं होती हैं, जो किसी न किसी रूप में खेल संघों से सम्बद्ध होती हैं. इन्हें स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों से भी जोड़ा जाता है. इनमें सैकड़ों और कई बार हजारों शौकिया धावक भी हिस्सा लेते हैं. तमाम लोग इस दौड़ के छोटे से हिस्से को ही पूरा करते हैं. कई जगह हाफ मैराथन भी होती हैं.

आधुनिक युग में मैराथन दौड़ यूनान की एक दंतकथा से प्रेरित है. इसकी कहानी फ़ेडिप्पिडिस नामक यूनानी धावक से जुड़ी है. दंतकथा के अनुसार फ़ेडिप्पिडिस एक हरकारा था, जिसे मैराथन से एथेंस यह घोषित करने के लिए भेजा गया था कि मैराथन के युद्ध में (जिसमें वह खुद भी लड़ रहा था) फारसियों की पराजय हो गई है. यह ई.पू. 490 के अगस्त या सितंबर की घटना है. कहा जाता है कि फ़ेडिप्पिडिस पूरे रास्ते पर बिना रुके दौड़ा और फिर सभा में प्रवेश करके बोला नेनिकेकामेन, ‘हम जीत गए. और फिर वह गिर पड़ा और मर गया.

मैराथन से एथेंस की दौड़ का पहला वृत्तांत प्लूटार्क की एथेंस कीर्ति में मिलता है, जो पहली सदी में लिखी गई थी और हेराक्लाइडस पॉण्टिकस की लुप्त कृति को संदर्भित करते हुए धावक का नाम एर्चियस या यूक्लस का थेर्सिपस बताया गया था. एक और लेखक समोसाता के लूशियन (दूसरी सदी) ने भी इस कथा को लिखा है, पर धावक का नाम फ़ेलिप्पिडिस बताया है, फ़ेडिप्पिडिस नहीं। बहरहाल यह किंवदंती है. इसका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. यूनानी-फ़ारसी युद्धों के प्रमुख स्रोत, यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस, फ़ेडिप्पिडिस को एक हरकारे के रूप में वर्णित करते हैं जो मदद का संदेश लेकर एथेंस से स्पार्टा और वापस गए, एक तरफ से यह दूरी 240 किलोमीटर (150 मील) से भी ज़्यादा है.

भारोत्तोलन की दो तकनीकें

भारोत्तोलन प्रतियोगिता में ताक़त और तकनीक की परीक्षा होती है. इसमें प्रतियोगियों के भार के हिसाब से कई वर्ग बनाए जाते हैं. मुक्केबाज़ी, कुश्ती और जूडो, कराते और भारोत्तोलन जैसी प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों के शरीर का वज़न भी महत्वपूर्ण होता है. इसलिए इनमें खिलाड़ियों को अलग-अलग वज़न के आधार पर वर्गीकृत करते हैं. ऊँचे दर्जे के भारोत्तोलक अपने वज़न से तीन गुना ज़्यादा तक भार उठा लेते हैं.

इन दिनों हो रहे कॉमनवैल्थ खेल में भारत की मीराबाई चानू ने 48 किलो वर्ग में भाग लेते हुए कुल 196 किलोग्राम भार उठाया. यह भार दो बार में अलग-अलग तकनीकों के तहत उठाया गया था. भारोत्तोलन में प्रतियोगी को दो तरह की तकनीकों से भार उठाने के लिए कहा जाता है. पहली तकनीक है स्नैच, जिसमें भार को सीधे एकबारगी सिर के ऊपर तक उठाना होता है. दूसरी तकनीक क्लीन एंड जर्क कहलाती है. इसमें भार को दो चरणों में सिर के ऊपर तक उठाना होता है. सफलतापूर्वक भार उठाने के लिए भारोत्तोलक के हाथ सिर के ऊपर तक जाने चाहिए और शरीर का सीधा रहना जरूरी होता है. हर भारोत्तोलक को भार उठाने के लिए तीन अवसर मिलते हैं.

कहाँ और कब बनी पहली कार?                                            

हालांकि शुरू में भाप से चलने वाली गाड़ियाँ बनी थीं, पर इंटरनल कॉम्बुशन इंजन से चलने वाली पहली कार सन 1870 में ऑस्ट्रिया के वियना शहर में सिग्फ्राइड मार्कस ने तैयार की. वह गैसोलीन से चलती थी. इसे फर्स्ट मार्कस कार कहते हैं. मार्कस ने ही 1888 में सेकंड मार्कस कार तैयार की जिसमें कई तरह के सुधार किए गए थे. इस बीच जर्मनी के मैनहाइम में कार्ल बेंज ने सन 1885 में तैयार की.

नॉटिकल मील क्या होता है?

नॉटिकल मील का इस्तेमाल आमतौर पर समुद्री और हवाई नेवीगेशन में होता है. लम्बाई के हिसाब से यह करीब 1852 मीटर या 6076 फुट होता है. सागर और आकाश के नेवीगेशन में आमतौर पर अक्षांश-देशांतर का इस्तेमाल होता है. भूमध्य रेखा और उससे उत्तर या दक्षिण में इसकी दूरी में मामूली फर्क भी आता रहता है.